Saturday, 3 August 2013

ek kavita likhne ka vada h

ek kavita hmesha
likhne ka sankalp h
जिस दिन नहीं लिखूं
तो, कुछ हफ्ते इंतजार करना
फिर भी लिखती नही दिखूं
तो, मान लेना कि
मै  जीवित नही हूँ
(और रहत की साँस लेना)

kyon lgta h

क्यों लगता है
तुम्हारा रूप पारदर्शी
क्योंकि, तुम्हारे सौन्दर्य के
उस पर भी
होता है, एक देवीय अहसास
जो ,तुम्हारी उन्मुक्त हंसी से
उपजा होता है
देता है दिलासा मन को
और ,तुम्हारे रूप की ओर
आकर्षित  करता है

मित्रता दिवश पर भेंट कविता की
जोगेश्वरी 

Friday, 2 August 2013

bahut sidhi poem h

बेहद सीधी कविता है

रात के आँचल में झिलमिलाते
जगमगाती चांदनी के फूल
दूर दूर तक खोई होती है
रात अपने ही आगोश में
चंद्रमा जब करता है सफ़र
उमगते ह्युए निशीथ में
रिमझिम बारिश के संग
भीगा होता है , हर समां
धुंधले वीराने तब महक कर
लगने लगते है जंवा जंवा
अंधकार का मटमैलापन
वर्षा में हो जाता है ,गाढ़ा
 

अभी इतनी ही लिखी है , ये कविता
जोगेश्वरी 

ehi aash

एही आस अटक्यो रहे ,अली कली के मूल

मेरी नही है , ये कविता , या कहे दोहा 

Thursday, 1 August 2013

ye kiski yadon ne

 अधूरी कविता , कल पूरी की

ये किसकी यादों ने
ली, दिल में अंगडाई
कि , तुम्हारी आँखों से
झलक पड़ा है ,यौवन
गुनगुना उठी है दिशाए
महकने लगे है ,वन-उपवन
ये किसकी परछाई
कसमसाई नैनों की झील में
लगता है ,जैसे सरोवर में
उतरा रहे है कमल
ये किसके अधरों ने किया है
आलिंगन का अनुवाद
कि ,आसमान तक
लहरा रहा है , तुम्हारा आँचल
वो,पहाड़ों पर छा रही है
घटाएं काली -मतवाली
लगता है ,जैसे आँखों में
आंज लिया है ,तुमने काजल

जोगेश्वरी 

Tuesday, 30 July 2013

sapnon ke ganv me

यूँ ही लिख रही हूँ, ये कविता
क्यूंकि , रोज तुमसे एक कविता
लिखने का वादा है

झिलमिल सितारों की छाँव में
जहाँ  अँधेरा बुनता है
कोई, रहस्य
और गुम  हो जाती है
अपनी ही पहचान
जब बादलों से झांकता है
चंद्रमा ,
झीलों में चांदनी का
आँचल लहराता है
जब, कोई पक्षी तडपता है
गूंजने लगती है
कंही शहनाई
ख़ामोशी खुद को ही
जब, सुनने लगती है
तुम्हारी याद तब
सन्नाटे को चिर कर
कैसे गुनगुनाती है
विहंसती है
मुस्कराती है 

Saturday, 27 July 2013

tujhe bhul jana...

सच कामिनी ,
सोने का ये ढंग
कान्हा से सीखा है
चुनरी को
दन्त-पंक्तियों में दबा कर
मुठ्ठियों में
आंचल को भीच कर
जब तुम सोती हो
सरोवर में खिलती
कमलिनी की याद अति है
जो भ्रमर मन को बांध कर
प्रात तक नही नही पसीजती