Sunday, 27 October 2013

rahbar

गंगा तट पर 
चलते हुए 
तुम्हारे पद चिन्हों को 
सहेज लिया है ,मैंने 
उस राह्पर 
उस रह से 
किसी को 
गुजर जाने नही दिया 
हमने 

Thursday, 24 October 2013

sahra sahra

सहरा
सहरा सहरा फुल खिले है 
जब भी प्यार में 
दो दिल मिले है 

अभी लिखी ये कविता 

pyar ki umr

प्यार की उम्र का  वो दौर 
जब न जिया जाता है 
न ही मर सकते है 
बीएस एक जगह ठहरा सा 
जमा हुवा अहसास होता है जो, 
जो, तमाम उम्र साथ चलता है 

vo, surmai andhra

वो  आसमान  में चमकते सितारे 
वो , सुरमई  अँधेरे 
झिलमिलाते तारों के उजारे 
कुछ कहती हुयी 
गुनगुनाती हुई 
गुजरती जाती रात 
इसे में , अचानक हो गयी 
बिच में बावली बरसात 
आधी  रत की निश्त्ब्धता में 
गूंजता पपीहे का राग 
दिल में अधूरी रह गयी 
कोई, भूली बिसरी साध 
रह जाती है 
जाने किस कोने में सिमटी 
सखी सहेलियों की 
हंसी -ठिठोली की बात 
जाने कन्हा खो जाते है , स्वप्न 
और छुट जाते है 
साथ चलते चलते हाथ 
खो जायेंगे हम कंही तो 
रखना तुम हमको याद 

Monday, 21 October 2013

kuchh jlnshil tatv

कुछ लोग जलनशील होते है
यदि वो किसीको, जरा सा भी
संतुस्ट देखते है
तो, उनके मन को दुःख होता है 

Sunday, 20 October 2013

sadhya-snata

स्ध्यस्नाता 
रूप तुम्हारा 
जैसे क्षीर सागर का 
फेनिला ज्वार 
जैसे सर्दी का नया नया 
माह , क्वांर 
जैसे चांदी  के कलश 
पर दूध के छींटे 

Saturday, 19 October 2013

kavita likhe bin

कविता लिखे बिना 
नही मिलेगी मुक्ति