से आँखों वाली सुनो। ....... ये मेरी गज़ल नही है मुझे बेहद पसंद है वैसे तुम्हारी लबरेज नयन भी तो कुछ ऐसे ही है न
Friday, 3 January 2014
जितना जितना कि तुम्हारे अधरों से ये फूल शब्द चन्दन जैसा तेरा रंग
कितना अच्छा लगा था जब तुमने मुस्कराकर इतराकर मुझे ये फूल कहा था फूल यानि मुर्ख सच इतना खट्टा मीठा तो संतरा भी नही होगा जितना मीठा तेरे मुंह से ये फूल लगता है
tumhari तुम्हारी आँखों में जो दरिया उतरता है उसमे खिले है कितने गुलाबी कमल कितने प्यारे गुलाबी कमल ये मेरी मोहब्बत की मासूम प्यारी सी गज़ल तुम आज भी हो और कल भी रहोगी आबाद , ये है, मेरे दिल कि दुआ अविकल जान तेरी आँखों में जो इतना नशा छलका है कंही कंही , ये मेरे प्यार का तो नही और तेरे लबों पर मुस्कराहट उसका तो कहना क्या
शोख शोख ये तेरी शोख चंचल चितवन जिससे महका महका है दिल का उपवन बहुत याद आ रहे है ये फूल दिल को मत जाना तुम भूल तुम खुद हो एक ताजमहल तो ताजमहल तो, ताजमहल क्यों बनाये दिल के अरमानों को संगमरमर में क्यों दफनाये क्यों करे याद कुछ बनाकर तुम्हे सलामत रहना है जीवनभर ये इतनी जल्दी क्या है अभी तो पूरी कविता लिखी ही नही अभी से पब्लिश करना है , क्या
Wednesday, 1 January 2014
ये तेरी तिरछी चंचल चितवन चुरा लेती है देखने वालों का मन