Sunday, 5 January 2014

 से आँखों वाली सुनो। ....... 
ये मेरी गज़ल नही है 
मुझे बेहद पसंद है 
वैसे तुम्हारी लबरेज नयन भी तो कुछ ऐसे ही है न 

Friday, 3 January 2014

जितना
जितना कि तुम्हारे अधरों से 
ये फूल शब्द 
चन्दन जैसा तेरा रंग 
कितना अच्छा लगा था 
जब तुमने मुस्कराकर 
इतराकर 
मुझे ये फूल कहा था 
फूल यानि मुर्ख 
सच इतना खट्टा मीठा तो 
संतरा भी नही होगा 
जितना मीठा तेरे मुंह से 
ये फूल लगता है 
tumhari 
तुम्हारी आँखों में जो 
दरिया उतरता है 
उसमे खिले है 
कितने गुलाबी कमल 
कितने प्यारे गुलाबी कमल 
ये मेरी मोहब्बत की 
 मासूम प्यारी सी गज़ल 
तुम आज भी हो 
और कल भी रहोगी 
आबाद ,
ये है, मेरे दिल कि दुआ अविकल 

जान 
तेरी आँखों में जो इतना नशा 
छलका है 
कंही कंही , ये मेरे प्यार का तो नही 
और तेरे लबों पर मुस्कराहट 
उसका तो कहना क्या 

nav vadhu:  शोख  शोख ये तेरी शोख चंचल चितवन जिससे महका महक...

nav vadhu:  शोख
 शोख
ये तेरी शोख चंचल चितवन
जिससे महका महक...
:  शोख   शोख  ये तेरी शोख चंचल चितवन  जिससे महका महका  है  दिल का उपवन  बहुत याद आ रहे है ये फूल  दिल को मत जाना तुम भूल  तुम खुद हो ...
 शोख 
 शोख 
ये तेरी शोख चंचल चितवन 
जिससे महका महका  है 
दिल का उपवन 

बहुत याद आ रहे है ये फूल 
दिल को मत जाना तुम भूल 
तुम खुद हो एक ताजमहल तो ताजमहल 
तो, ताजमहल क्यों बनाये 
दिल के अरमानों को 
संगमरमर में क्यों दफनाये 
क्यों करे याद कुछ बनाकर  
तुम्हे सलामत रहना है 
जीवनभर 

ये इतनी जल्दी क्या है 
अभी तो पूरी कविता लिखी ही नही 
अभी से पब्लिश करना है , क्या 

Wednesday, 1 January 2014

ये तेरी 
तिरछी चंचल चितवन 
चुरा लेती है 
देखने वालों का मन