Saturday, 20 July 2013

hosh knha rahta h, tumhe


होश कंहाँ रहता है , तुम्हे 
सोते हुए बिखरे गेशुओं का 
केशों में लगाये पुष्प-दल का 
अस्त-व्यस्त आंचल का 
बिसूरे हुए काजल का 
पांवों में सजती पायल का 
पारिजात , तुम्हे तो 
इस हाल में सोये देख 
चंद्रमा भी रास्ता 
भूल जाता है , अस्ताचल का 

jb tum soti ho

जब भी तुम सोती हो
बिछौने पर अलमस्त
अधरों पर अल्हड
उन्मादी मुस्कराहट लिए
सच, ऐसे सजीव दृश्य  को
निरखकर तो,
फिर से जल उठते है
स्वत बुझे  हुये दिये

सधीर 

Thursday, 18 July 2013

aj nhi likhna

आज इतना धैर्य नही , कि दो शब्द भी लिखूं ,
जबकि कवितायेँ ५ लिख  रखी है 

bihar ne rulaya h

  बिहार में जो बच्चों को दलिया में  मौत   बांटी गयी है , उसके बाद क्या आपको वो नन्हे मासूम बच्चे यद् नही आते , जो अपनी मासूम मुस्कराहट बिखेरते ,इधर उधर दौड़ते भागते है .
मै आज चाहती हूँ कि   जुझारू        

Tuesday, 16 July 2013

b tp tutne lge

पपीहा सा मन
जब कूह्कने लगे
देह से दूध की
धाराएँ जब फूटने लगे
तब, साधारण जन की
क्या बिशात
विश्वामित्र का तप भी
जब, टूटने लगे

सधीर 

madhuyamini

करवटें बदलती ,धड़कती  रातों की
सितारों से सुसज्जित नभ में
उतराती खचित परातों  की
अंगडाई लेती ,चन्द्र-ज्योत्स्ना से
असमान की मनुहारी बातों की
मधु-सिंचित मुस्कराते फूलों की
सुवासित इठलाती बारातों की
लहकती महकती बौराती आती
गंगा की उफनती मौजों की
शहनाई सी गूंजती तन्हाई में
निशा के लहकते झंझावातों की
मदभरी मुस्कानों में छिपी
अनंग की अनकही बातों की
लिखी नही जाती कोई कविता
मधुयामिनी ली लजाती   मुलाकातों की

(यंहा, मौजों को पहले चक्रवात लिखी थी, किन्तु, आजकल मौसम के मिजाज को देखकर उसे मौजों में बदल दी ) जोगेश्वरी सधीर 

Monday, 15 July 2013

vo

vo, आचार्य चतुरसेन शास्त्री क्या कहता है